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यकृत के सिरोसिस के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सा

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आयुर्वेद में, सिरोसिस ऑफ लिवर को यक्रित वृधि के रूप में जाना जाता है। जिगर मानव शरीर में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है और जिगर की किसी भी बीमारी से गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। यकृत का सिरोसिस यकृत का एक पुराना, अपक्षयी रोग है जिसमें जिगर की कोशिकाओं का निरंतर विनाश और निशान होता है। जैसे ही जिगर की कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, उन्हें निशान के ऊतकों द्वारा बदल दिया जाता है।

आयु और आयु के अनुसार लक्षण और लक्षण


जिगर के सिरोसिस का सबसे आम कारण शराब का अत्यधिक उपयोग है। यह शरीर में कई अंगों को नुकसान पहुंचाता है लेकिन यह लीवर के लिए सबसे हानिकारक है। एक दोषपूर्ण और अस्वास्थ्यकर आहार भी इस बीमारी के कारण का एक कारण है। हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और हेपेटाइटिस डी, दवाओं, विषाक्त पदार्थों और संक्रमणों से भी यकृत के सिरोसिस होते हैं।
जिगर का रंग लाल से पीले रंग में बदल जाता है और यह सिकुड़ भी जाता है। चयापचय की प्रक्रिया में बाधा आती है और इसके परिणामस्वरूप भूख और वजन कम हो जाता है। यह दस्त, पेट फूलना और पुरानी गैस्ट्रिटिस के बाद हो सकता है और साथ ही लीवर आईडी के क्षेत्र में दर्द का अनुभव हो सकता है। शरीर सूज जाता है। व्यक्ति को खांसी और सांस लेने में कठिनाई महसूस हो सकती है, जो यकृत के बढ़े हुए आकार के कारण होता है जो डायाफ्राम पर दबाव डालता है।

जिगर के सिरोसिस के लिए कुछ उत्कृष्ट आयुर्वेदिक उपचार हैं।


1. भृंगराज – यह लीवर के सिरोसिस के लिए सबसे अच्छा उपाय है। तना, फूल, जड़ और पत्तियों से निकाले गए रस का उपयोग सिरोसिस को ठीक करने के लिए किया जाता है। रस से भरा एक चाय चम्मच शहद के साथ मिलाया जाता है और शिशु सिरोसिस के मामले में दिया जाता है।
2. कटुकी – यह वयस्कों के लिए यकृत के सिरोसिस के लिए पसंद की दवा है। हरड़ की जड़ के चूर्ण का प्रयोग किया जाता है। एक चाय का चम्मच जड़ के चूर्ण में बराबर मात्रा में शहद के साथ मिलाकर दिन में तीन बार लेना चाहिए। कब्ज के मामले में खुराक को दोगुना तक बढ़ाया जा सकता है। खुराक के बाद एक कप गर्म पानी लेना चाहिए। कटु जिगर को अधिक पित्त का उत्पादन करने के लिए उत्तेजित करता है, ऊतकों को पुन: सक्रिय करता है और इसलिए यह फिर से काम करना शुरू कर देता है।
3. अरोग्यवर्धिनी वैटी – यह कातुकी और तांबे का एक यौगिक है और सिरोसिस के उपचार में बहुत उपयोगी है। 250 मिलीग्राम की दो गोलियां दिन में तीन बार गर्म पानी के साथ लेनी चाहिए। हालत की गंभीरता के आधार पर खुराक को एक दिन में चार गोलियों तक बढ़ाया जा सकता है।
4. त्रिफला, वसाका और काकामाक्षी कुछ अन्य दवाएं हैं जो जिगर के सिरोसिस के उपचार के लिए आयुर्वेद द्वारा अनुशंसित हैं।

आयुर्वेद द्वारा निर्धारित अन्य प्राकृतिक अवशेष

उपर्युक्त आयुर्वेदिक दवाओं के अलावा, कुछ घरेलू उपचार भी हैं जो यकृत के सिरोसिस के मामले में स्थिति को बेहतर बनाने में सहायक हैं।
पपीते के बीज इस बीमारी को ठीक करने में मददगार होते हैं। पपीते के बीजों को पीसकर एक चाय के चम्मच नींबू के रस के साथ मिलाया जाना चाहिए और इसे रोजाना दो बार लेना चाहिए। यह यकृत के सिरोसिस के लिए एक उत्कृष्ट घरेलू उपाय है।
लीवर की विभिन्न स्थिति के लिए गाजर का रस और पालक का रस बेहद उपयोगी है। इसलिए, गाजर और पालक के रस का मिश्रण लिया जाना चाहिए जो यकृत की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।
अंजीर की पत्तियों का उपयोग लीवर के सिरोसिस के लिए एक लाभकारी उपाय के रूप में भी किया जाता है। अंजीर की पत्तियों को चीनी के साथ मैश किया जाता है और 200 मिलीलीटर पानी दिन में दो बार लिया जाना चाहिए।
मूली लीवर के सिरोसिस को ठीक करने में भी सहायक है। किसी भी रूप में मूली को आहार में शामिल किया जाना चाहिए। इसके अलावा मूली के पत्तों से बने रस और नरम तने का सेवन रोज सुबह खाली पेट किया जाना चाहिए।
एक चुटकी सेंधा नमक के साथ नीबू का रस लेना सबसे आसान और सबसे कुशल तरीका है जिससे लीवर की कार्यप्रणाली में सुधार होता है।
एक चुटकी सेंधा नमक के साथ टमाटर का रस भी इस स्थिति के लिए एक अच्छा उपाय है।

डाइट और अन्य रजिस्टर

लीवर से संबंधित किसी भी बीमारी के इलाज में आहार सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सभी वसायुक्त, तैलीय, तले हुए और मसालेदार पदार्थ और खाद्य पदार्थों को पचाने के लिए कठोर नहीं लेना चाहिए।
शराब पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए और चाय, कॉफी और तंबाकू से भी बचना चाहिए।
गाय का दूध या बकरी का दूध, गन्ने का रस दिया जाना चाहिए दही के ऊपर बटर मिल्क को प्राथमिकता देनी चाहिए। लहसुन को लिवर के सिरोसिस के लिए भी मददगार माना जाता है।
यदि पेट तरल पदार्थ के साथ जमा होता है, तो रोगी को आहार को नमक मुक्त बनाया जाना चाहिए।
कब्ज होने पर स्थिति बिगड़ जाती है और इसे हटा दिया जाना चाहिए।
ताजा फलों और सब्जियों को आहार में शामिल करना चाहिए। जिन सब्जियों का स्वाद कड़वा होता है जैसे करेला, ड्रमस्टिक।
भारी व्यायाम नहीं करना चाहिए और केवल धीमी गति से चलने की सलाह दी जाती है।


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आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार विधि द्वारा कैंसर, किडनी, डायबिटीज के उपचार में नवीनतम अनुसंधानों का लाभ ले।

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वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम डायबिटीज के इंजेक्शन और दवाईयों से छुटकारा:

ज्यादातर मरीजों को एक सप्ताह में ही दवाओं और इंजेक्शन से छुटकारा मिल जाता है और उसका शुगर पहले से बेहतर नियंत्रित भी रहता है.डायबिटीज के दुष्परिणाम भी ठीक हो सकते हैं: सीरम क्रिएटिनिन में कमी, अधिक ऊर्जा, उम्र बढ़ने और कायाकल्प। अधिक यौन शक्ति और उत्साह के साथ कामेच्छा की हानि में सुधार। बिना किसी दवा के स्तंभन दोष का सुधार।

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार डायबिटीज में कैसे काम करता है।

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार का वैज्ञानिक आधार:

डायबिटीज की मुख्य वजह है शरीर की कोशिकाओं के द्वारा एनर्जी / उर्जा का सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाना। आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार के द्वारा कोशिकाओं के मेटाबोलिज्म को ठीक किया जाता है जिससे कोशिकाओं द्वारा उर्जा का सही इस्तेमाल होने लग जाता है।आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से डायबिटीज की मूल समस्या ही ख़त्म हो जाती है। जब कोशिकाएं उर्जा का सही इस्तेमाल करने लगती हैं तो शरीर में ताकत आती है जिससे सेक्स की समस्या मिट जाती है और आप सुखी जीवन का आनंद ले सकते हैं। क्योंकि आपके भय का अंत हो जाता है इसलिए आप परिवार और समाज के लिए सार्थक जीवन जीते हैं। डायबिटीज में आयुलर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से किडनी फेलियर जैसे दुष्परिणाम नहीं होते।आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से डायबिटीज के दुष्परिणाम जैसे किडनी फेलियर, कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज, नपुंसकता इत्यादि भी ठीक होते हैं।

मधुमेह का आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार सबसे वैज्ञानिक है और मधुमेह की सभी जटिलताओं को रोकने में कारगर साबित होता है।

डायबिटीज में किडनी फेलियर के भय से बेहतर है आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार के द्वारा डायबिटीज की मूल समस्या ही खत्म हो जाती है, और आप किडनी फेलियर, हृदयाघात, अंधापन जैसे दुष्परिणाम से बच जाते हैं।

यह उपचार डायबिटीज टाइप -1 और टाइप 2 दोनों में सामान रूप से कारगर है.

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक पद्धति द्वारा डायबिटीज के उपचार के फायदे

इंजेक्शन से मुक्ति (टाइप-1 और टाइप-2 दोनों में) आप मधुमेह के मधुमेह के उपचार द्वारा इंजेक्शन और मधुमेह की सभी दवाओं से छुटकारा पा सकते हैं और आपकी शर्करा और कोलेस्ट्रॉल अपने आप नियंत्रित हो जाते हैं डायबिटीज के दुष्परिणाम- अंधापन, हृदयाघात और किडनी फेलियर की सम्भावना न के बराबर होती है. यदि आप आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक मधुमेह के उपचार में अपनाते हैं, तो गुर्दे की विफलता जैसी जटिलताओं का कोई मौका नहीं है।असमय बुढापे से मुक्ति : डायबिटीज के मरीज की उम्र 20 साल और बढ़ाई जा सकती है।मरीज़ को मानसिक समस्या जैसे- यादाश्त कम होना, डिप्रेशन, सुस्ती, इत्यादि से मुक्ति.जोड़ों का दर्द, स्फूर्ति की कमी, इत्यादि से मुक्ति.पेट की समस्या जैसे- दर्द, कब्जियत, बार-बार पेट ख़राब होना, इत्यादि से मुक्ति.आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से कैंसर होने की सम्भावना ख़त्म हो जाती है।आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से शरीर में रोग प्रतिरक्षण (इम्युनिटी) की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे सर्दी, बुखार, जुकाम, इत्यादि कम होता है.आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से किडनी मजबूत होता है, और उसके ख़राब होने की सम्भावना न के बराबर होती है।हृदयरोग (Atherosclerosis) से बचाव करता है आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से सेक्स की समस्या भी ठीक होती है।

डायबिटीज में वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार लें

मेटाबोलिक उपचार डायबिटीज टाइप -1 और टाइप 2 दोनों में सामान रूप से कारगर है।

यह उपचार वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और दुष्परिणामों को रोकने में सक्षम है।

मधुमेह का आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार सबसे वैज्ञानिक है और मधुमेह की सभी जटिलताओं को रोकने में कारगर साबित होता है।

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार की सफलता दर:

डायबिटीज के परम्परागत उपचार जैसे रोज इंजेक्शन लेना अथवा शुगर कण्ट्रोल करने की दवाई इत्यादि से शुगर कभी भी कण्ट्रोल नहीं हो सकता।इस तरह के उपचार से किडनी फेलियर इत्यादि से बचाव भी नहीं होता।यही वजह है कि गणमान्य लोग जिसे अच्छी चिकित्सा उपलब्ध है वह ज्यादा किडनी फेलियर का शिकार हो रहे हैं।

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार से शुगर तुरंत ही कण्ट्रोल हो जाता है क्योंकि इसमें कोशिकाओं की मुख्य समस्या ही खत्म हो जाती है । क्योंकि बिमारी की वजह ही ख़त्म हो जाती है इसलिए किडनी फेलियर, हृदयाघात इत्यादि की संभावना ही नहीं रहती।

शुगर कण्ट्रोल के अलावा मरीजों को कई अन्य फायदे भी होते हैं।इस तरह आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार परम्परागत एलोपैथिक उपचार से बेहतर है।

मधुमेह का आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार सबसे वैज्ञानिक है और मधुमेह की सभी जटिलताओं को रोकने में कारगर साबित होता है।

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार ही क्यों?

अमेरिका में इस चिकित्सा पद्धति ने पारंपरिक इंजेक्शन पर आधारित उपचार का अंत कर दिया है। इस उपचार में शुगर स्वतः ही कण्ट्रोल हो जाता है और किडनी फेलियर जैसे दुष्परिणाम की कोई संभावना ही नहीं रहती। डायबिटीज के मरीज अपने चिकित्सक से क्या सवाल करें?

डायबिटीज के मरीज अपने चिकित्सक से निम्नलिखित सवाल जरूर पूँछें. ये सवाल आपकी जिंदगी बदल सकते हैं

जो दवाई अथवा इंजेक्शन आपको दिया जा रहा है उससे कितने दिनों में शुगर कण्ट्रोल हो जाएगा.आपके चिकित्सक जिसका उपचार कर रहे हैं उसमें कितने लोगों का शुगर कण्ट्रोल है अथवा जिसका HbA1C, 6 से कम है अगर दूसरे किसी भी मरीज का शुगर उस दवाई से कंट्रोल नहीं है फिर इस बात की क्या संभावना है कि उसी दवाई से आपका शुगर कण्ट्रोल हो जाएगा.आपके चिकित्सक द्वारा उपचार में कितने डायबिटीज के मरीज जिसकी उम्र 50 वर्ष से ज्यादा है और उसका किडनी स्वस्थ है अथवा क्रिएटिनिन 1 से कम है.अगर ज्यादातर लोगों की किडनी फेल हो जा रही है फिर इसकी क्या संभावना है कि आप उसी दवा को खाकर किडनी फेलियर से बच जायेंगे. जिस डॉक्टर से उपचार आप ले रहे हैं क्या उसके किसी भी मरीज का शुगर नियंत्रित हुआ है अगर हाँ तो उसके घर जाकर जरूर सत्यता की जांच करें. जिस डॉक्टर से आप उपचार ले रहे हैं कहीं उसे ही तो डायबिटीज नहीं है अगर हाँ तो फिर जो चिकित्सक खुद का उपचार नहीं कर पाए, तो फिर क्या यह संभव है कि उनसे कोई भी मरीज का शुगर नियत्रित हो पायेगा?

डॉ विवेक श्रीवास्तव
जीवक आयुर्वेदा 
 हेल्पलाइन 7704996699


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यदि आप गठिया से हैं परेशान तो यह पोस्ट आपके लिए है

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आज कल हमारी दिनचर्या हमारे खान -पान से गठिया का रोग 45 -50 वर्ष के बाद बहुत से लोगो में पाया जा रहा है । गठिया में हमारे शरीर के जोडों में दर्द होता है, गठिया के पीछे यूरिक एसीड की बड़ी भूमिका रहती है। इसमें हमारे शरीर मे यूरिक एसीड की मात्रा बढ जाती है। यूरिक एसीड के कण घुटनों व अन्य जोडों में जमा हो जाते हैं। जोडों में दर्द से रोगी का बुरा हाल रहता है। इस रोग में रात को जोडों का दर्द बढता है और सुबह अकडन मेहसूस होती है। इसकी पहचान होने पर इसका जल्दी ही इलाज करना चाहिए अन्यथा जोडों को बड़ा नुकसान हो सकता है।हम यहाँ पर गठिया के अचूक उपाय बता रहे है…….

दो बडे चम्मच शहद और एक छोटा चम्मच दालचीनी का पावडर सुबह और शाम एक गिलास मामूली गर्म जल से लें। एक शोध में कहा है कि चिकित्सकों ने नाश्ते से पूर्व एक बडा चम्मच शहद और आधा छोटा चम्मच दालचीनी के पावडर का मिश्रण गरम पानी के साथ दिया। इस प्रयोग से केवल एक हफ़्ते में ३० प्रतिशत रोगी गठिया के दर्द से मुक्त हो गये। एक महीने के प्रयोग से जो रोगी गठिया की वजह से चलने फ़िरने में असमर्थ हो गये थे वे भी चलने फ़िरने लायक हो गये।

लहसुन की 10 कलियों को 100 ग्राम पानी एवं 100 ग्राम दूध में मिलाकर पकाकर उसे पीने से दर्द में शीघ्र ही लाभ होता है।

सुबह के समय सूर्य नमस्कार और प्राणायाम करने से भी जोड़ों के दर्द से स्थाई रूप से छुटकारा मिलता है।

एक चम्मच मैथी बीज रात भर साफ़ पानी में गलने दें। सुबह पानी निकाल दें और मैथी के बीज अच्छी तरह चबाकर खाएं।मैथी बीज की गर्म तासीर मानी गयी है। यह गुण जोड़ों के दर्द दूर करने में मदद करता है।

गठिया के रोगी 4-6 लीटर  पानी पीने की आदत डालें। इससे ज्यादा पेशाब होगा और अधिक से अधिक विजातीय पदार्थ और यूरिक एसीड बाहर निकलते रहेंगे।

एक बड़ा चम्मच सरसों के तेल में लहसुन की 3-4 कुली पीसकर डाल दें, इसे इतना गरम करें कि लहसुन भली प्रकार पक जाए, फिर इसे आच से उतारकर मामूली गरम हालत में इससे जोड़ों की मालिश करने से दर्द में तुरंत राहत मिल जाती है।

प्रतिदिन नारियल की गिरी के सेवन से भी जोड़ो को ताकत मिलती है।

आलू का रस 100 ग्राम प्रतिदिन भोजन के पूर्व लेना बहुत हितकर है।

प्रात: खाली पेट एक लहसन कली, दही के साथ दो महीने तक लगातार लेने से जोड़ो के दर्द में आशातीत लाभ प्राप्त होता है।

250 ग्राम दूध एवं उतने ही पानी में दो लहसुन की कलियाँ, 1-1 चम्मच सोंठ और हरड़ तथा 1-1 दालचीनी और छोटी इलायची डालकर उसे अच्छी तरह से धीमी आँच में पकायें। पानी जल जाने पर उस दूध को पीयें, शीघ्र लाभ प्राप्त होगा ।

संतरे के रस में १15 ग्राम कार्ड लिवर आईल मिलाकर सोने से पूर्व लेने से गठिया में बहुत लाभ मिलता है।

अमरूद की 4-5 नई कोमल पत्तियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा काला नमक मिलाकर रोजाना खाने से से जोड़ो के दर्द में काफी राहत मिलती है।

काली मिर्च को तिल के तेल में जलने तक गर्म करें। उसके बाद ठंडा होने पर उस तेल को मांसपेशियों पर लगाएं, दर्द में तुरंत आराम मिलेगा।

दो तीन दिन के अंतर से खाली पेट अरण्डी का 10 ग्राम तेल पियें। इस दौरान चाय-कॉफी कुछ भी न लें जल्दी ही फायदा होगा।

दर्दवाले स्थान पर अरण्डी का तेल लगाकर, उबाले हुए बेल के पत्तों को गर्म-गर्म बाँधे इससे भी तुरंत लाभ मिलता है।

गाजर को पीस कर इसमें थोड़ा सा नीम्बू का रस मिलाकर रोजाना सेवन करें । यह जोड़ो के लिगामेंट्स का पोषण कर दर्द से राहत दिलाता है।

हर सिंगार के ताजे 4-5 पत्ती को पानी के साथ पीस ले, इसका सुबह-शाम सेवन करें , अति शीघ्र स्थाई लाभ प्राप्त होगा ।

गठिया रोगी को अपनी क्षमतानुसार हल्का व्यायाम अवश्य ही करना चाहिए क्योंकि इनके लिये अधिक परिश्रम करना या अधिक बैठे रहना दोनों ही नुकसान दायक हैं।

100 ग्राम लहसुन की कलियां लें।इसे सैंधा नमक,जीरा,हींग,पीपल,काली मिर्च व सौंठ 5-5 ग्राम के साथ पीस कर मिला लें। फिर इसे अरंड के तेल में भून कर शीशी में भर लें। इसे एक चम्मच पानी के साथ दिन में दो बार लेने से गठिया में आशातीत लाभ होता है।

जेतुन के तैल से मालिश करने से भी गठिया में बहुत लाभ मिलता है।

सौंठ का एक चम्मच पावडर का नित्य सेवन गठिया में बहुत लाभप्रद है।

गठिया रोग में हरी साग सब्जी का इस्तेमाल बेहद फ़ायदेमंद रहता है। पत्तेदार सब्जियो का रस भी बहुत लाभदायक रहता है।

गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर इसका लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है। अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करे

डॉ विवेक श्रीवास्तव
(प्राक्रतिक चिकित्सक )
जीवकआयुर्वेदा
☎7570901365


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कीमोथेरेपी क्यों नहीं है कैंसर का सफल उपचार

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कीमोथेरेपी क्यों नहीं है कैंसर का सफल उपचार

कीमोथेरेपी का उद्देश्य कैंसर कोशिकाओं को मारना और बीमारी को ठीक करना है। लेकिन कीमोथेरेपी से एक भी कैंसर रोगी ठीक नहीं हुआ है। इलाज के कई दावे हैं लेकिन वे मरीज कैंसर से पीड़ित नहीं थे। उनमें से अधिकांश का इलाज अमेरिका में चयापचय विधियों द्वारा किया गया था और भारत में यह खबर फैली थी कि उन्होंने कीमोथेरेपी ली है।

कृपया किसी भी कॉर्पोरेट या सरकारी एजेंसियों सहित किसी पर भी भरोसा करने से पहले कैंसर के इलाज के बारे में सावधानी से समझ लें। वे कुछ उद्योग के लाभ के लिए काम कर सकते हैं।

कभी भी किसी भी प्रकार की कीमोथेरेपी के लिए मत जाओ क्योंकि इससे आपको कभी भी बचत नहीं होगी बल्कि रोगियों की कीमोथेरेपी के कारण मृत्यु हो जाती है। चूंकि कैंसर का सुरक्षित और प्रभावी उपचार अभी उपलब्ध है, इसलिए कैंसर के हर मरीज को एक उम्मीद है। कीमोथेरेपी की सफलता दर

कीमोथेरेपी किसी भी प्रकार के कैंसर का इलाज नहीं कर सकती है। लेकिन अगर कोई कीमोथेरेपी लेता है तो उसके बचने की संभावना 2% से कम होती है। शोध में दिखाए गए अनुसार कीमोथेरेपी की पांच वर्षीय उत्तरजीविता दर 2% से कम है।

कीमोथेरेपी विधि का साइड इफेक्ट्स

पिछले कुछ समय से डरावनी कहानियों को सुनकर कई लोग कीमोथेरेपी को लेकर भयभीत हैं। ऑन्कोलॉजिस्ट आपको समझाएगा कि हाल के अग्रिमों ने इस उपचार को कम विषाक्त बना दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि इस जहरीले उपचार से अब तक किसी मरीज को कोई फायदा नहीं हुआ है।

मतली और उल्टी: मतली और उल्टी शायद कीमोथेरेपी के सबसे अधिक भयभीत दुष्प्रभाव हैं। इस तरह से आपका शरीर इस उपचार से दूर जाने के लिए आपको सुरक्षा और चेतावनी दे रहा है। तब आपका डॉक्टर आपको लक्षण को नियंत्रित करने के लिए शामक देता है। 

बालों का झड़ना: कीमोथेरेपी के साथ बालों का झड़ना आम है, और हालांकि यह आपके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक नहीं है, लेकिन यह भावनात्मक रूप से बहुत परेशान कर सकता है।

अस्थि मज्जा का दमन: अस्थि मज्जा का दमन कीमोथेरेपी के अधिक खतरनाक दुष्प्रभावों में से एक है। इससे मरीजों की तुरंत मौत हो जाती है। अस्थि मज्जा के नुकसान के कारण अस्थि मज्जा में रक्त बनाने वाली कोशिकाएं होती हैं जो संक्रमण और एनेमिया के कारण रोगी को जीवित और मर नहीं सकती हैं।
मुंह के घाव: लगभग 30 प्रतिशत से 40 प्रतिशत लोग उपचार के दौरान कीमोथेरेपी-प्रेरित मुंह घावों का अनुभव करेंगे। स्वाद परिवर्तन: स्वाद परिवर्तन, जिसे अक्सर “धातु के मुंह” के रूप में जाना जाता है, कीमोथेरेपी से गुजरने वाले आधे लोगों के लिए होता है।
परिधीय न्यूरोपैथी: मोजा-दस्ताना वितरण (हाथ और पैर) में झुनझुनी और दर्द कीमोथेरेपी-प्रेरित परिधीय न्यूरोपैथी से संबंधित सामान्य लक्षण हैं और कीमोथेरेपी प्राप्त करने वाले लोगों के लगभग एक तिहाई को प्रभावित करता है।

आंत्र परिवर्तन: कीमोथेरेपी की दवाएं दवा के आधार पर कब्ज से लेकर दस्त तक आंत्र परिवर्तन का कारण बन सकती हैं। 

सन सेंसिटिविटी: कई कीमोथेरेपी दवाएं धूप में बाहर जाने पर आपके सनबर्न होने की संभावना को बढ़ा देती हैं, कुछ को कीमोथेरेपी-प्रेरित फोटोटॉक्सिसिटी के रूप में जाना जाता है।
केमोब्रेन: कीमोथ्रेन शब्द को कीमोथेरेपी के दौरान और बाद में कुछ लोगों द्वारा अनुभव किए गए संज्ञानात्मक प्रभावों का वर्णन करने के लिए गढ़ा गया है। मल्टीटास्किंग के साथ वृद्धि हुई भूलने की बीमारी से कठिनाई के लक्षण निराशाजनक हो सकते हैं, और यह परिवार के सदस्यों को इस संभावित दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करने में मदद कर सकता है। कुछ लोग पाते हैं कि अपने दिमाग को क्रॉसवर्ड पज़ल्स, सुडोकू, या जो भी “ब्रेन टीज़र” जैसे व्यायाम से सक्रिय रखते हैं, वे उपचार के बाद के दिनों और हफ्तों में मददगार हो सकते हैं। 
थकान: कीमोथेरेपी का सबसे आम साइड इफेक्ट है, लगभग प्रभावित करना हर कोई जो इन उपचारों को प्राप्त करता है। दुर्भाग्य से, इस तरह की थकान एक प्रकार की थकान नहीं है जो एक कप कॉफी या नींद की एक अच्छी रात का जवाब देती है।

कीमोथेरेपी के दीर्घकालिक दुष्प्रभाव

कीमोथेरेपी के दीर्घकालिक दुष्प्रभाव आमतौर पर आपकी पहली चिंता नहीं है जब आप सुनते हैं कि आपको कैंसर के लिए कीमोथेरेपी की आवश्यकता है। सभी कैंसर उपचारों के साथ, उपचार के लाभों को संभावित जोखिमों के खिलाफ तौला जाना चाहिए। फिर भी, कुछ देर के दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी होना महत्वपूर्ण है- 

साइड इफेक्ट्स जो कैंसर के इलाज के पूरा होने के महीनों या सालों बाद तक भी नहीं हो सकते हैं। अल्पकालिक साइड इफेक्ट्स के रूप में, इन लक्षणों का अनुभव करने वाले ऑड्स आपको प्राप्त होने वाली विशेष कीमोथेरेपी दवाओं पर निर्भर करेंगे। कुछ देर के प्रभावों में शामिल हैं:

हृदय रोग: कुछ कीमोथेरेपी दवाएं दिल की क्षति का कारण बन सकती हैं। क्षति का प्रकार हृदय की विफलता से वाल्व की समस्याओं से कोरोनरी धमनी रोग तक हो सकता है। यदि आप इनमें से कोई भी दवा प्राप्त कर रहे हैं, तो उपचार शुरू करने से पहले आपका डॉक्टर हृदय परीक्षण की सलाह दे सकता है। सीने में विकिरण चिकित्सा से दिल से संबंधित समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। 
बांझपन: कई कीमोथेरेपी दवाओं के परिणामस्वरूप बांझपन का इलाज होता है। यदि कोई ऐसा मौका है जिसे आप कीमोथेरेपी के बाद गर्भ धारण करना चाहेंगे, तो कई लोगों द्वारा शुक्राणु या फ्रीजिंग भ्रूण जैसे विकल्पों का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है। उपचार शुरू करने से पहले इस चर्चा को सुनिश्चित करें। 

परिधीय न्यूरोपैथी: कुछ कीमोथेरेपी एजेंटों के कारण आपके पैरों और हाथों में झुनझुनी, सुन्नता और दर्द कई महीनों तक बना रह सकता है, या स्थायी भी हो सकता है, जैसा कि उल्लेख किया गया है, अनुसंधान किया जा रहा है। न केवल इस दुष्प्रभाव का इलाज करने के तरीकों की तलाश करें, बल्कि इसे पूरी तरह से होने से रोकें। 
सैकेंडरी कैंसर: चूंकि कुछ कीमोथेरेपी दवाएं कोशिकाओं में डीएनए के नुकसान का कारण बनकर काम करती हैं, वे न केवल कैंसर का इलाज कर सकती हैं, बल्कि किसी को कैंसर के रूप में भी विकसित होने का शिकार कर सकती हैं। इसका एक उदाहरण उन लोगों में ल्यूकेमिया का विकास है, जिन्हें आमतौर पर स्तन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली दवा के साथ इलाज किया जाता है। कीमोथेरेपी पूरी होने के बाद ये कैंसर अक्सर पांच से 10 साल या उससे अधिक समय तक होते हैं।

अन्य संभावित देर से प्रभाव में सुनवाई हानि या मोतियाबिंद से लेकर फेफड़े के फाइब्रोसिस तक के लक्षण शामिल हो सकते हैं। हालांकि इन प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं का जोखिम आमतौर पर उपचार के लाभ की तुलना में कम होता है, अपने डॉक्टर से साइड इफेक्ट्स के बारे में बात करने के लिए कुछ समय लें जो आपके विशेष कीमोथेरेपी के लिए अद्वितीय हो सकते हैं।

तो, यह स्पष्ट है कि कीमोथेरेपी के दुष्प्रभाव कैंसर की तुलना में अधिक खतरनाक हैं।

जोखिम भरा उपचार क्यों लें जो कभी आपकी समस्या का समाधान न करें। ऐसे उपचार का विकल्प चुनना बेहतर है जो कैंसर से जुड़ी सभी समस्याओं को हल कर सके।

कीमोथेरेपी कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए जहरीली सामग्री है। लेकिन पिछले कई वर्षों से यह देखा जाता है कि उपचार की यह विधि किसी भी प्रकार के कैंसर का इलाज नहीं कर सकती है।

बल्कि आमतौर पर कैंसर के मरीज इस उपचार को लेने से मर जाते हैं। जो लोग इस उपचार को लेते हैं, वे लंबे समय तक नहीं रहते हैं क्योंकि आमतौर पर उन रोगियों में कीमोथेरेपी दवाओं के कारण ऑन्कोजीनिटी के कारण कई अंगों में कैंसर विकसित होता है। ये दवाएं सामान्य कोशिकाओं को भी मार देती हैं और उसी वजह से मरीजों की मौत हो जाती है।

आयर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए डिज़ाइन किया गया है और सामान्य कोशिकाओं के लिए पूरी तरह से हानिरहित है क्योंकि आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार कैंसर ऊर्जा चयापचय में कमजोर बिंदुओं का उपयोग करता है। 

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार के अतिरिक्त रसायन

उपचार की विषाक्तता: कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए कीमोथेरेपी में इस्तेमाल की जाने वाली साइटोटोक्सिक दवाएं जो कोशिकाओं के डीएनए पर कार्य करती हैं। जबकि आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार लक्ष्य के रूप में कैंसर सेल के ऊर्जा मेटाबोलिक का उपयोग करता है। ये साइटोटोक्सिक दवाएं द्वितीयक कैंसर और अचानक मृत्यु आदि जैसे दुष्प्रभावों वाले रोगियों के लिए बहुत हानिकारक हैं। 

कैंसर कोशिकाओं को मारने में सक्रियता: चूंकि कैंसर कोशिकाओं और सामान्य कोशिकाओं के बीच डीएनए में कोई अंतर नहीं है, कीमोथेरेपी सामान्य कोशिकाओं को मारे बिना कैंसर कोशिकाओं को नहीं मार सकती है। जबकि आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार कैंसर कोशिकाओं के ऊर्जा चयापचय का उपयोग करता है। चूंकि कैंसर कोशिकाओं का ऊर्जा चयापचय प्रकृति में अवायवीय है, जबकि सामान्य कोशिकाएं ज्यादातर एरोबिक श्वसन का उपयोग करती हैं। इस प्रकार कैंसर की कोशिकाएं चुनिंदा रूप से मार दी जाती हैं। 

उपचार के अत्यधिक प्रभाव:

आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार हानिरहित होता है, जबकि कीमोथेरेपी जहरीली साइटोटोक्सिक दवाओं के उपयोग के कारण हानिकारक होती है। 

असफल दर: ​​कीमोथेरेपी की सफलता दर या 5 साल की जीवित रहने की दर केवल 2% है, जबकि आयुर्वेदिक चयापचय उपचार 60% से अधिक पांच साल की जीवित रहने की दर दे सकता है। 

विकसित देशों से प्रमाण जानने के लिए लिंक पर कृपया क्लिक करें। https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/15630849

जीवन की गुणवत्ता: आयुर्वेदिक व मेटाबोलिक उपचार जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है, जबकि कीमोथेरेपी कैंसर के रोगियों के जीवन की गुणवत्ता को खराब करती है।

जीवन प्रत्याशा और जीवन रक्षा: रसायन विज्ञान में जीवन रक्षा और दीर्घायु जीवन की प्रत्याशा और जीवन की गुणवत्ता में कमी आयुर्वेदिक व चयापचय उपचार में वृद्धि की जाती है।

डॉ विवेक श्रीवास्तव
जीवक आयुर्वेदा  
हेल्पलाइन 7704996699


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आयुर्वेद में ही है कैंसर का इलाज़

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कैंसर की चिकित्सा के दौरान जीवक आयुर्वेदा व मैने यह अनुभव किया कि 98% कैंसर के मरीज सर्वप्रथम अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के अनुसार ही अपना ईलाज करवाते हैं। जहाँ सर्वप्रथम उन्हें बहुत अधिक शक्तिशाली एवं भयंकर एन्टीबायोटिक दी जाती है ताकि जो रोग समझ में नहीं आ रहा है, उस पर किसी तरह विजय दिखाई जा सके। ये दवायें शरीर के अन्दर भूचाल ला देती हैं। त्रिदोषों में और अधिक असाम्यता पैदा हो जाती है तथा सबसे अधिक बुरा असर पहले से ही कुपित वात पर पङता है।
जब उन भयंकर एंटीबायोटिक इंजेक्शनों का सार्थक असर भी दिखाई नहीं पड़ता तब विभिन्न टेस्टों के माध्यम से कैंसर होने का सबूत इकट्ठा करते हैं और फिर कीमोथेरेपी, रेडियेशन एवं अन्य अति भयंकर चिकित्सा शुरू कर देते हैं।
आप सभी जानते हैं कीमोथेरेपी / रेडिएशन थेरेपी में क्या होता है – इसमें कैंसर सेल्स को खत्म किया जाता है। कैंसर कोशिकाओं की एक सहज पहचान जो ये कीमोथेरेपी की दवायें करतीं हैं और पहचान कर उन्हें खत्म कर देतीं हैं, वह है – इनके एक से दो, 2 से 4, 4 से 8, 8 से 16,….…में बहुत तेजी से विभक्त होकर बढ़नें की प्रक्रिया । इस कीमोथेरेपी में बस यही एक पहचान है कि जो भी एक कोशिका विभक्त होकर दो कोशिकाओं के रुप में बनने की प्रक्रिया में है, उसे नष्ट कर देना है। (In cancer, the cells keep on dividing until there is a mass of cells.) 
अरबों खरबों सेल्स मिलकर शरीरगत एक टिश्यू का निर्माण करते हैं। (Body tissues are made of billions of individual cells.)
This mass of cells becomes a lump, called a tumour.
Because cancer cells divide much more often than most normal cells, chemotherapy is much more likely to kill them.
In cancer, the cells keep on dividing until there is a mass of cells. This mass of cells becomes a lump, called a tumour.
चूंकि मज्जा धातु के अन्तर्गत ही कोशिकाओं का निर्माण होता है, अतः कीमोथेरेपी में Bone marrow tissues को असामान्य ढंग से नष्ट कर दिया जाता है, जिसके फलस्वरूप मज्जागत वात अत्यन्त कुपित हो जाती है और शरीर में भयंकर, असहनीय, अन्तहीन और इलाज हीन दर्द शुरू हो जाता है। 
पूरा का पूरा वातवह संस्थान (Neuro System of the Body) छिन्न भिन्न हो जाता है।
ऐसी स्थिति में केवल एक ही आयुर्वेदिक दवा काम कर सकती है और वह अश्वगंधा घृत,पुर्ननवा,हल्दी।


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चमकी बुखार का कहर आयुर्वेद करेगा असर

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देश में कई जगह एवं विशेष रूप से बिहार में दिमागी  बुखार / चमकी बुखार अपने प्रचंड रुप में सैकड़ों लोगों की मौत का कारण बन गया है। सम्पूर्ण एलोपैथी चिकित्सा पद्धति ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को भी आना पड़ा पर रिजल्ट ?

आयुर्वेदज्ञों को आगे आ कर मानवता के हित में काम करना ही होगा, दूसरा कोई उपाय नहीं है। मुझे लगता है निम्नलिखित इलाज प्राण रक्षा करने में समर्थ होगा :-
*शहद के साथ दालचीनी का पाउडर – चार वक्त
* महा सुदर्शन घन बटी + स्वर्ण बसंत मालती रस + अमृतारिष्ट – दो वक्त
* लवंग + कज्जली + शहद – तीनों वक्त
* हरताल गोदंती भस्म + मोती पिष्ठी + प्रवाल पिष्ठी – तीन बार चन्दनादि तेल लगाने हेतु।

कोई सामान्य व्यक्ति वगैर आयुर्वेदज्ञों की सलाह व उचित देखरेख के बिना इस फार्म्यूलेशन का प्रयोग न करे। आप सभी विद्वान आयुर्वेदज्ञों से अनुरोध है कि यदि आप अपना अनुभव शेयर करें तो बहुत कृपा होगी।

डॉ विवेक श्रीवास्तव
जीवक आयुर्वेदा


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World Autism Awareness Day: कहीं आपका बच्चा भी तो ऑटिज्म से पीड़ित नहीं ?

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क्या आपका बच्चा आपके चेहरे के हावभाव को देखकर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है? क्या वह आपकी आवाज सुनने के बावजूद न तो खुश होता है और न ही कुछ जवाब देता है? क्या वह दूसरे बच्चों की तुलना में ज्यादा चुप रहता है? अगर आपके बच्चे में भी ये लक्षण हैं तो हो सकता है कि वह ऑटिज्म से पीड़ित हो। क्या है आटिज्म? कैसे पहचानें ? और क्या है इलाज़ ? इसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं जीवक आयुर्वेदा के निदेशक टी के श्रीवास्तव।

आटिज्म क्या है ?
आटिज्म एक मस्तिष्क का विकार है जो अक्सर इससे ग्रस्त व्यक्ति का दूसरों के साथ संबंधित होना कठिन बनाता है। आटिज्म में, मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्र एक साथ काम करने में विफल हो जाते हैं। इसे आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार भी कहा जाता है।

आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार के तीन प्रकार हैं
ऑटिस्टिक डिसऑर्डर (Autistic Disorder)
एस्पर्जर सिन्ड्रोम (Asperger Syndrome)
परवेसिव डेवलपमेंटल डिसऑर्डर (Pervasive Developmental Disorder)

आटिज्‍म के लक्षण

अपने नाम पर प्रतिक्रिया देने में विफल रहना।
गले से लगाने या पकड़ने पर विरोध करना और अकेले खेलना पसंद करना।
नज़रें मिलाने से बचना और चेहरे के अभिभावों का न होना।
न बोलना या बोलने में देरी करना या पहले ठीक से बोलने वाले शब्द या वाक्यों को न बोल पाना।
वार्तालाप को शुरू नहीं कर पाना या जारी नहीं रख पाना या केवल अनुरोध के लिए बातचीत शुरू करना।
एक असामान्य लय से बोलना, एक गीत की आवाज़ या रोबोट जैसी आवाज़ का उपयोग करना।
शब्दों या वाक्यांशों को दोहराना लेकिन उनके उपयोग की समझ न होना।
सरल प्रशनों या दिशाओं को समझने में असमर्थता।
अपनी भावनाओं को व्यक्त न करना और दूसरों की भावनाओं से अनजान रहना।
निष्क्रिय, आक्रामक या विघटनकारी होने के कारण सामाजिक संपर्क से बचना।
कुछ गतिविधियों को दोहराना, जैसे – हिलना, घूमना या हाथ फड़फड़ाना या खुद को नुक्सान पहुंचाने वाली गातीधियाँ (जैसे सिर पटकना)।
विशिष्ट दिनचर्या या अनुष्ठान विकसित करना और थोड़े ही बदलाव में परेशान हो जाना।
लगातार हिलते रहना।
असहयोगी व्यवहार करना या बदलने के लिए प्रतिरोधी होना।
समन्वय की समस्याएं या अजीब गतिविधियां करना (जैसे पैर के पंजों पर चलना)।
रौशनी, ध्वनि और स्पर्श के प्रति असामान्य रूप से संवेदनशील होना और दर्द महसूस न करना।
कृत्रिम खेलों में शामिल न होना।
असामान्य तीव्रता या ध्यान लगाकर कोई कार्य या गतिविधि करते रहना।
भोजन की अजीब पसंद होना, जैसे कि केवल कुछ खाद्य पदार्थों को खाना या कुछ खास बनावट वाले पदार्थों का ही सेवन करना।

आटिज्म क्यों होता है?
ऑटिज्म के वास्तविक कारण के बारे में फिलहाल जानकारी नहीं है। पर्यावरण या जेनेटिक प्रभाव, कोई भी इसका कारण हो सकता है। वैज्ञानिक इस संबंध में जन्म से पहले पर्यावरण में मौजूद रसायनों और किसी संक्रमण के प्रभाव में आने के प्रभावों का भी अध्ययन कर रहे हैं। शोधों के अनुसार बच्चे के सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाने वाली कोई भी चीज ऑटिज्म का कारण बन सकती है। कुछ शोध प्रेग्नेंसी के दौरान मां में थायरॉएड हॉरमोन की कमी को भी कारण मानते हैं। इसके अतिरिक्त समय से पहले डिलीवरी होना। डिलीवरी के दौरान बच्चे को पूरी तरह से आक्सीजन न मिल पाना। गर्भावस्था में किसी बीमारी व पोषक तत्वों की कमी प्रमुख कारण है।
बच्चे के जन्म के छह माह से एक वर्ष के भीतर ही इस बीमारी का पता लग जाता है कि बच्चा सामान्य व्यवहार कर रहा है या नहीं। शुरुआती दौर में अभिभावकों को बच्चे के कुछ लक्षणों पर गौर करना चाहिए। जैसे बच्चा छह महीने का हो जाने पर भी किलकारी भर रहा है या नहीं। एक वर्ष के बीच मुस्कुरा रहा है या नहीं या किसी बात पर विपरीत प्रतिक्रिया दे रहा है या नहीं। ऐसा कोई भी लक्षण नजर आने पर अभिभावक को तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

आटिज्‍म से बचाव
आटिज्म होने से रोका नहीं जा सकता है लेकिन आप इसके कुछ जोखिम को कम कर सकते हैं यदि आप निम्नलिखित जीवनशैली के परिवर्तनों का प्रयास करते हैं –
स्वस्थ रहें – नियमित जाँच करवाएं, अच्छी तरह संतुलित भोजन और व्यायाम करें। सुनिश्चित करें कि आपकी अच्छी जन्मपूर्व देखभाल हुई है और सभी सुझाए गए विटामिन व पूरक आहार लें।
गर्भावस्था के दौरान दवाएं न लें – गर्भावस्था में किसी भी प्रकार की दवा लेने से पहले अपने डॉक्टर से पूछें। खासकर दौरों को रोकने वाली दवाएं।
शराब न लें – गर्भावस्था के दौरान शराब का सेवन न करें।
डॉक्टर की सलाह लें – यदि आपको आटिज्म के कोई भी लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें, आप जीवक आयुर्वेदा के हेल्पलाइन नंबर 7704996699 पर निःशुल्क सलाह प्राप्त कर सकते हैं।


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इंटरनेशनल डे ऑफ हैप्पीनेस: इन रोगों से रहना है दूर तो रहे खुश

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20 मार्च को दुनियाभर में इंटरनेशनल डे ऑफ हैप्पीनेस या अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस मनाया जाता है। मतलब कि आज सिर्फ और सिर्फ खुशियां ही मनाना। नो रोना-धोना, नो गुस्सा, ओन्ली हैप्पीनेस विद स्माइल। खुश रहना आपके सेहत के लिए बेहद लाभदायक है इसी विषय पर जानकारी दे रहे जीवक आयुर्वेदा के निदेशक टी के श्रीवास्तव।

लगातार मानसिक दबाव या तनाव कई तरह के मानसिक विकारों को जन्म देता है, अनेक शारीरिक समस्याओं का कारण बनता है, जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, थायराइड आदि, इसके बारे में हम आपको विस्तािर से जानकारी देते हैं.

डिप्रेशन के कारण बीमारियां

हमें दैनिक कार्यों में अनेक प्रकार के तनाव झेलने पड़ते हैं। खासतौर पर वर्तमान युग की तेज रफ्तार जिन्दगी में हमें रोज अनेकों समस्याओं से जूझना पड़ता है और इसके कारण तनाव होता है। लगातार मानसिक दबाव या तनाव अनेक मानसिक विकारों को जन्म देता है, अनेक शारीरिक समस्याओं का शिकार बनता है. जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, थायरोइड इत्यादि। चलिये जानें डिप्रेशन के कारण कौंन कौंन सी बीमारियां हो सकती हैं-

कैंसर

कैंसर के लगभग 60 प्रतिशत रोगी डिप्रेशन से भी ग्रस्त होते हैं क्योंकि अवसाद के कारण इक्यूनसिस्टम बदल जाता है। किसी भी व्यक्ति के अवसाद ग्रस्त होने के पीछे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आनुवांशिक तथा जैव वैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। अवसाद से पीडि़त रोगी का उपचार आमतौर पर सायकोथैरेपी के द्वारा किया जाता है।

के लगभग 60 प्रतिशत रोगी डिप्रेशन से भी ग्रस्त होते हैं क्योंकि अवसाद के कारण इक्यूनसिस्टम बदल जाता है। किसी भी व्यक्ति के अवसाद ग्रस्त होने के पीछे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आनुवांशिक तथा जैव वैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। अवसाद से पीडि़त रोगी का उपचार आमतौर पर सायकोथैरेपी के द्वारा किया जाता है।

मोटापा

एक अध्ययन में पाया गया है कि बचपन के अवसाद का अगर जल्द इलाज और रोकथाम कर लिया जाए, तो वयस्क होने पर दिल की बीमारी का खतरा कम हो सकता है। अवसादग्रस्त बच्चों के मोटे, निष्क्रिय होने और धूम्रपान करने की संभावना होती है जो किशोरावस्था में ही दिल की बीमारियों के कारण बन सकते हैं। अमेरिका की युनिवर्सिटी ऑफ साउथ फ्लोरिडा में मनोविज्ञान में यह शोध हुआ।

डिमेंशिया

नए शोध से पता चला है कि अवसाद से ग्रस्त लोगों में डिमेंशिया होने का ख़तरा सामान्य से दो गुना अधिक हो सकता है। डिमेंशिया से इंसान की मानसिक क्षमता, व्यक्तित्व और व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है। जिन लोगों को डिमेंशिया होता है उनकी याद्दाश्त पर असर पड़ता है. अमरीकन पत्रिका न्यूरोलॉजी में ये तथ्य प्रकाशित हुए।

समय से पहले बुढ़ापा

मानसिक बीमारी पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर (पीटीएसडी) से पीड़ित लोगों को समय से पहले बुढ़ापा आने का खतरा होता है। नए शोध में यह बात सामने आई है। पीटीएसडी कई मानसिक विकारों जैसे गंभीर अवसाद, गुस्सा, अनिद्रा, खान-पान संबंधी रोगों तथा मादक द्रव्यों के सेवन से जुड़ी व्याधि है।

दिल की बीमारियां

एक अध्ययन में पाया गया है कि बचपन के अवसाद का अगर जल्द इलाज और रोकथाम कर लिया जाए, तो वयस्क होने पर दिल की बीमारी का खतरा कम हो सकता है। अवसादग्रस्त बच्चों के मोटे, निष्क्रिय होने और धूम्रपान करने की संभावना होती है जो किशोरावस्था में ही दिल की बीमारियों के कारण बन सकते हैं।

मधुमेह

अवसाद की समस्या मधुमेह की ओर इशारा करती है। कई सालों से यह माना जाता था कि अवसाद की समस्या की जड़ मधुमेह है। हाल के कई शोधों में यह बिंदु सामने आया कि अवसाद से समस्या जटिल होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मधुमेह के पीछे चिंता और तनाव का ही हाथ होता है. यदि कोई व्यक्ति अवसाद ग्रस्त है तो उसे मधुमेह होने की संभावना सामान्य व्यक्ति के मुकाबले दुगनी होती है।

बहरेपन का खतरा अधिक

हाल ही में हुए एक शोध में बहरेपन से संबंधित एक नई जानकारी मिली है। इस शोध की मानें तो अवसाद में रहने वाले लोगों को बहरेपन का खतरा ज्याबदा होता है।  अमेरीका में हुए इस शोध में शोधकर्ताओं ने 18 साल व इससे अधिक उम्र के पुरुषों और महिलाओं पर अध्ययन किया। इसका असर पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर अधिक दिखा।

क्यों मनाया जाता है हैप्पीनेस डे

संयुक्त राष्ट्र संघ (यूनाइटेड नेशन्स) ने 20 मार्च को इंटरनेशनल हैप्पीनेस डे के रूप में घोषित किया है। 12 जुलाई 2012 को यूनाइटेड नेशन्स की जनरल असेंबली ने इस बात की घोषणा की कि पूरे विश्व में प्रतिवर्ष 20 मार्च को हैप्पीनेस डे मनाया जाएगा। पिछले साल यानी 2013 से इसे विश्वभर में पूरे उत्साह के साथ मनाना शुरू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य विश्व में सभी को अवसाद मुक्त कर खुश रखना है ।

कामयाबी का राज है हैप्पीनेस

आपको पता है, खुश रहने से कठिनाइयां कम आती हैं और अगर आ भी जाएं तो कठिन से कठिन समस्या का 50 फीसदी समाधान तुरंत ही हो जाता है। जो लोग खुश रहते हैं, वे अपने जीवन में खुशियां बांटने के साथ-साथ दूसरों के लिए भी प्रेरणा का काम करते हैं।

खुशी से दूर रहेगी दिल की बीमारी

खुश रहने और सकारात्मक सोच रखने से हृदय रोगों से दूर रहा जा सकता है। 1700 लोगों पर दस वर्ष तक किए गए अध्ययन के बाद यह बात सामने आई है कि जो लोग हमेशा परेशान रहते हैं और अवसाद से घिरे रहते हैं, उनमें हृदय रोग होने की आशंका अधिक होती है। अध्ययन से यह बात भी सामने आई कि जिन लोगों के जीवन में खुशी के पल अधिक आते हैं, उनमें दिल की बीमारी होने की संभावना 22 फीसद कम होती है।

डॉक्टरों का कहना है कि खुश रहने से दिल को बहुत फायदा मिलता है। गुस्सा दिल के लिए बहुत हानिकारक है। हृदय रोगों के मामले को लेकर आने वाले लोगों को वे सलाह देते हैं कि गुस्से की आदत को बदल दिया जाए। गुस्सा आने पर हृदय की गति और ब्लड प्रेशर बढ़ने से हार्ट की डिमांड बढ़ जाती है। ऐसी डिमांड का बढ़ना सबसे खतरनाक होता है। विशेष रूप से हृदय रोगियों के लिए, क्योंकि इससे कई बार एन्जाइना का अटैक भी हो सकता है इसलिए सभी को खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए।

खुश रहने से मिलती अच्छी नीद और तनाव होता है कम

 आम जिदंगी में खुश रहने वाले लोगों को नींद अच्छी आती है और वे तनाव में भी कम आते हैं। ऐसे लोग तनाव के दौर से जल्द बाहर आ जाते हैं, जिनका उनके स्वास्थ्य पर अच्छा असर देखने को मिलता है। आमतौर पर लोग एक-दो हफ्ते की छुट्टी लेकर घूमने-फिरने मजा करने जाते हैं, जबकि उन्हें हर दिन खुशी के पल ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए। अगर किसी को उपन्यास पढ़ने का शौक है तो एक बार में पढ़ने की बजाय हर 15 मिनट में पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। यह बात हर शौक पर लागू होती है, जिसे करके व्यक्ति को खुशी मिलती है और उसका मूड अच्छा हो जाता है। हालांकि दिल की बीमारी को खुशमिजाज जीवनशैली से जोड़कर देखने का सीमित महत्व है।

क्या है इलाज़ ?

जीवक आयुर्वेदा अवसाद ग्रस्त मरीजों के इलाज़ के लिए अपनी त्रिस्तरीय चिकित्सा पद्धति अपनाता है जिसमे आयुर्वेदिक चिकित्सा, न्यूट्रीशन के साथ साथ योग चिकित्सा को शामिल किया जाता है । इसमें मरीज की स्थिति के अनुसार शमन-शोधन चिकित्सा, स्वस्थ आहार विहार के साथ योग क्रियाएं बताई जाती हैं ।    


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World Sleep Day 2019: जानिए आपके लिए कितनी जरूरी है नींद, इन बातों का रखें ध्यान

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World Sleep Day 2019 हर साल 15 मार्च को वर्ल्ड स्लीप-डे मनाया जाता है। वर्ल्ड स्लीप डे को वर्ल्ड स्लीप डे कमेटी ऑफ द वर्ल्ड स्लीप सोसाइटी द्वारा आयोजित किया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को नींद की समस्याओं के बोझ से छुटकारा दिलाना और नींद की गड़बडि़यों को लेकर लोगों को जागरूक करना होता है। इस साल वर्ल्ड स्लीप-डे का विषय ‘स्वस्थ नींद, स्वस्थ आयु’ है। वैसे तो नींद सभी को प्यारी होती है और इसके कई फायदे भी हैं। वर्ल्ड स्लीप-डे पर इससे जुड़ी कुछ जरूरी बातें बता रहे हैं जीवक आयुर्वेदा के निदेशक टी के श्रीवास्तव ।

नींद हमारे शरीर और मस्तिष्क दोनों के लिए प्रकृति का वरदान है। दौड़ती-भागती तनाव भरी जिंदगी में नींद का महत्व और बढ़ गया है।
रोजाना की भागदौड़, आपाधापी के चक्कर में हम ठीक से खाना और सोना तक भूल गए हैं, जिसकी वजह से अनेक शारीरिक और मानसिक परेशानियां हमें घेरने लगी हैं। ट्रैफिक की रेडलाइट से लेकर मोबाइल पर बेकार के मैसेजेज, इंटरनेट और न जाने कितनी चीजें हमें व्यर्थ का तनाव देती हैं। दिनभर की भागदौड़ के बाद हम थक कर घर वापस आते हैं तो हमें सुकून भरी और आरामदायक नींद की आवश्यकता होती है। रात में कम से कम 6 से 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए, जिससे अगले दिन के कामकाज के लिए अपने मस्तिष्क को तरोताजा कर सकें। इस तरह से हम अपने जीवन का एक तिहाई हिस्सा सोने में बिता देते हैं, जो हमारी सेहत के लिए बेहद जरूरी होता है।

दो तरह की नींद
हम दो तरह की नींद लेते हैं। एक वह नींद, जिससे हम शारीरिक रूप से ज्यादा क्रियाशील रहते हैं। इसमें हमारी आंखें हिलती-डुलती रहती हैं। इस नींद में जब हम कोई स्वप्न देखते हैं तो उसे याद रख पाते हैं। दूसरी तरह की नींद में हमारी शारीरिक क्रिया न्यूनतम होती है। इस समय हम गहरी नींद में होते हैं, जिससे शरीर और मस्तिष्क को ज्यादा आराम और सुकून मिलता है। इस चैनभरी नींद से एक तरह से हमारे शरीर का उपचार होता है। लोगों के सोने की आदत अलग-अलग किस्म की होती है। कुछ लोग लंबी नींद लेने में विश्वास रखते हैं, तो कुछ थोड़े समय की नींद लेते हैं। 6 घंटे की नींद लेने वाले व्यक्ति काफी चुस्त-दुरुस्त होते हैं, जबकि 9 घंटे और इससे ज्यादा लंबी नींद लेने वाले लोग नींद के आशक्त होते हैं।

नीद न आने वाली बीमारी (अनिद्रा)
अनिद्रा एक नींद से सम्बन्धित समस्या है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है। संक्षेप में, अनिद्रा से पीड़ित व्यक्तियों के लिए नींद आना या सोते रहना मुश्किल होता है। अनिद्रा के प्रभाव बहुत भयंकर हो सकते हैं। अनिद्रा आमतौर पर दिन के समय नींद, सुस्ती, और मानसिक व शारीरिक रूप से बीमार होने की सामान्य अनुभूति को बढाती है। मनोस्थिति में होने वाले बदलाव (मूड स्विंग्स), चिड़चिड़ापन और चिंता इसके सामान्य लक्षणों से जुड़े हुए हैं। अनिद्रा में नींद से जुड़े विकारों की एक विस्तृत श्रृंखला है, जिसमें अच्छी नींद के अभाव से लेकर नींद की अवधि में कमी से जुडी समस्याएं हैं। अनिद्रा को आमतौर पर तीन प्रकारों में विभाजित किया जाता है।

अस्थायी अनिद्रा: यह तब होती है, जब लक्षण तीन रातों तक रहते हैं।
एक्यूट अनिद्रा: इसे अल्पकालिक अनिद्रा भी कहा जाता है। लक्षण कई हफ्तों तक जारी रहते हैं।
क्रोनिक अनिद्रा: यह आमतौर पर महीनों और कभी-कभी सालों तक रहती है।

दिल के लिए है खतरनाक
नींद और हृदय गति का गहरा संबंध होता है। एक ताजा में शोध में यह बात सामने आयी है। हृदय रोगियों पर किए गए ताजा अध्ययन में पाया गया कि 96 फीसदी हृदय रोगियों में नींद के दौरान श्वसन संबंधी समस्या पाई जाती है। एक अन्य अध्ययन में यह बात साफ हुई थी कि 58 प्रतिशत हृदय रोगी नींद संबंधित समस्या से ग्रसित होते हैं और इनमें से 85 फीसदी को इस समस्या तथा हृदय रोग और नींद की कमी के संबंध का पता नहीं होता।

बनती है ओबेसिटी का कारण
न्यूजीलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन के बाद कहा कि नींद की कमी के कारण किशोरों को मोटापे का खतरा बढ़ जाता है। शोध से यह भी साफ हुआ कि किशोरियों के मामले में ऐसा नहीं है। यदि कोई किशोरी कम नींद ले पाती है तो उसे इस कारण मोटापे की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।

सोने के तरीके से कम हो जाएगी पेट
लोगों के बीच एक सोच घर कर गई है कि रात को नहीं खाने से कुछ वज़न कम हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है। आप कभी खाली पेट न सोएं। खाली पेट सोने की वजह से आपको नींद नहीं आएगी और नींद की कमी से आपका मोटापा बढ़ सकता है।

कमजोर होती है याददाशत
अगर आप बढ़ती उम्र के साथ पर्याप्त नींद नहीं ले रहे, तो सावधान हो जाइए। आपके दिमाग के घटते आयतन का संबंध कम नींद से हो सकता है। ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन के मुताबिक, नींद की कमी का संबंध मस्तिष्क के विभिन्न भागों जैसे अग्रभाग (फ्रंटल), कालिक (टेंपोरल) के आयतन में तेजी से कमी से हो सकता है।

बढ़ता है तनाव का खतरा
अगर अनिद्रा के लक्षणों का जल्द निदान और इलाज ना कराया जाए, तो यह गंभीर समस्या बन सकती है। एक अध्ययन में यह बात साफ हुई थी कि नींद न आने पर रोगी हमेशा के लिए अवसाद का शिकार हो सकता है। इस स्थिति में व्यक्ति के मस्तिष्क का न्यूरोट्रांसमीटर क्षीण हो जाता है। यदि अवसाद का समय पर इलाज न किया जाए तो यह गंभीर स्थिति बन जाती है।

चिड़चिड़ापन भी होता है
जब आपकी नींद पूरी नहीं होती, तो स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना लाजमी है। ऐसे लोगों को बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है। वे चिंता या अवसाद का शिकार हो सकते हैं। उनका बर्ताव भी असामान्य हो सकता है। उनकी स्मरण शक्ति पर भी असर पड़ता है और वे किसी बात पर अच्छी तरह ध्यान नहीं दे पाते।

तुरंत खाकर न सोएं
तुरंत खाकर न सोएं, खाने और सोने के वक्त कुछ गैप रखें। खाना खाकर तुरंत सोने से ब्लड शुगर और इंसुलिन बढ़ता है, इसकी वजह से वजन बढ़ सकता है। रोजाना रात को एक कप हर्बल चाय पीने से तोंद को कम करने में मदद मिलेगी।

नींद न आना भी है खतरनाक
आजकल की बदलती जीवनशैली में ज़्यादातर लोगों को नींद ने आने की समस्या है। नींद ने आने की इस समस्या को इन्सोमनिया कहते हैं। यह आमतौर पर लाइफस्टाइल में बदलाव होने की वजह से होता है। यह दो तरह का होता है-ट्रान्जिएंट और क्रॉनिक। इसका मुख्य कारण टेंशन, वातावरण में बदलाव, हॉर्मोंन्स में बदलाव है।

अच्छी सेहत के लिए कितनी जरूरी हैं नींद जानिए
नींद उतनी ही जरूरी है जितना कि खाना और व्यायाम। एक शरीर ठीक से काम करे इसके लिए कम से कम 6-8 घंटे की नींद जरूरी है। जो लोग कम सोते हैं उनके शरीर में लेप्टिन (भूख बढ़ाने वाला हार्मोन ) का स्तर कम होने की संभावना अधिक होती है, जिससे भूख बढ़ जाती है।

क्या है अनिद्राके उपाय
अगर किसी व्यक्ति को नींद न आने की समस्या 3 से 4 हफ्तों से ज्यादा समय तक रहती है तो उसे डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इस बीमारी को कुदरती इलाज से भी काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।
सोने से पहले गर्म पानी से स्नान करें। यह एक एक्सरसाइज की तरह होगा। गर्म पानी से नहाने के बाद बेड पर जाते ही आपको नींद आ जाएगी।
दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद आपको अपनी मांस-पेशियों को आराम देने और अच्छी नींद लेने के लिए अपने शरीर को कूल डाउन करने की जरूरत होती है। इसके लिए आप किसी टब या बाल्टी में गुनगुने पानी में अपने पैरों को डुबो कर रख सकते हैं।

अपने शरीर की मांस-पेशियों एवं ऊतकों को आराम देने के लिए आप एक चम्मच एप्सॉम साल्ट/डेड सी सॉल्ट को पानी में डाल सकते हैं। फूट बाथ आपकी त्वचा को अवांछित बैक्टीरिया से बचाती है और दिन भर की थकान से हुए पैर के दर्द को भी कम करती है।
उस गर्म पानी में आप कुछ आवश्यक तेल भी डाल सकते हैं, जिससे आपको रिलैक्स होने में मदद मिलती है। आप तुलसी ऑयल, देवदार वुड ऑयल, लैवेंडर ऑयल, रोजमैरी ऑयल और विंटर ग्रीन ऑयल का इस्तेमाल कर सकते हैं।

आपको केवल इन तेल की 1-2 बूंद पानी की बाल्टी में डालनी है। ये तेल शरीर के भीतरी भाग तक पहुंचकर रोम-रोम को सुकून देते हैं।
गर्म पानी थके हुए शरीर पर जादू का काम करता है। अगर किसी के पास सोने जाने से पहले गर्म पानी से नहाने का समय नहीं है तो कुछ देर तेल मिले गुनगुने पानी में अपने पैर डालकर बैठ सकते हैं।

इस उपाय से स्किन हाईड्रेट हेती है, मांस-पेशियां ढीली पड़ती हैं। इससे रिलैक्स होने में मदद मिलती है, जिससे आपको बिस्तर पर लेटते ही नींद आ जाती है। अनिद्रा से ग्रस्त लोगों के लिए लैवेंडर, जैस्मीन, नेरोली और यांग-लांग जैसे तेल से मालिश भी कारगर उपाय है।


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वर्ल्ड किडनी डे 2019: ऐसे रखें किडनी का ख्याल

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हमारी दोनों किडनियां एक मिनट में 1200 मिलिलीटर रक्त का शोधन करती हैं। ये शरीर से दूषित पदार्थो को भी बाहर निकालती हैं। इस अंग की क्रिया बाधित होने पर विषैले पदार्थ बाहर नहीं आ पाते और स्थिति जानलेवा होने लगती है जिसे गुर्दो का फेल होना (किडनी फेल्योर) कहते हैं। इस समस्या के दो कारण हैं, एक्यूट किडनी फेल्योर व क्रॉनिक किडनी फेल्योर। किडनी की समस्या के बारे में जानने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारी किडनी हमारे लिए क्या क्या करती है। इस बारे में जानकारी दे रहे हैं जीवक आयुर्वेदा के निदेशक टी के श्रीवास्तव ….

1. गुर्दे (Kidney) की रचना जितनी अटपटी है उसके कार्य उतने ही जटिल हैं। हानिकारक अपशिष्ट उत्पादों और विषैले कचरे को शरीर से बाहर निकालना और शरीर में पानी, तरल पदार्थ, खनिजों आदि का नियमन करना।

2. गुर्दे शरीर में फिल्टर का कार्य करते हैं और दूषित रक्त और दूषित विषाक्त को शरीर से बाहर निकालते हैं, इसलिए इन्हें शरीर का प्राकृतिक फिल्टर भी कहा जाता है।

3. शरीर का लगभग 20-25 प्रतिशत रक्त गुर्दे (किडनी) से पम्प होकर दिल और मस्तिष्क में जाता है।
4. गुर्दे की लम्बाई लगभग 12 से.मी. तक होती है। गुर्दे का वजन लगभग 140 ग्राम तक होता है।

5. खून को साफ करके पेशाब (Urine) बनाने का कार्य करने वाले गुर्दे की सबसे छोटी एवं बारीक छन्नी जिसे नेफ्रोन (Nephron) कहते हैं। प्रत्येक गुर्दे में लगभग दस लाख नेफ्रोन होते हैं।
 
6. प्रत्येक नेफ्रोन के मुख्य दो हिस्से होते हैं पहला ग्लोमेरुलस (Glomerulus) और दूसरा ट्यूब्यूल्स (Tubules)। इसमें ग्लोमेरुलस (रक्त वाहिनियों का गुच्छा) फ़िल्टर का काम करता है और सर्पाकार ट्यूब्यूल्स आर.ओ. का काम करती है, जो घुले हुए अनावश्यक लवणों को हटा देती हैं।

7. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की ग्लोमेरुलस के नाम से जानी जानेवाली छन्नी प्रत्येक मिनट में लगभग 125 मि.ली. प्रवाही बनाकर प्रथम चरण में 24 घंटों में 180 लीटर पेशाब (Urine) बनाती है। इस 180 लीटर पेशाब (Urine) में अनावश्यक पदार्थ, क्षार और जहरीले पदार्थ भी होते हैं। साथ ही इसमें शरीर के लिए उपयोगी ग्लूकोज तथा अन्य पदार्थ भी होते हैं।

8. ग्लोमेरुलस में बननेवाला 180 लीटर पेशाब (Urine) ट्यूब्यूल्स में आता है, जहाँ उसमें से 99 प्रतिशत द्रव का अवशोषण हो जाता है।

9. गुर्दे जरूरी पदार्थों को रख कर अनावश्यक पदार्थों को पेशाब द्वारा बाहर निकालते हैं जो एक अनोखी, अद्‍भुत तथा जटिल प्रक्रिया है।

10. शरीर में जो सात लीटर पानी होता है, उसकी प्रतिदिन करीब 400 बार छनाई और सफाई होती है।

11. क्या आप जानते हैं कि शरीर के दोनों गुर्दों में प्रति मिनट 1200 मि.ली. लीटर खून स्वच्छ होने के लिए आता है जो हृदय द्वारा शरीर में पहुँचनेवाले समस्त खून के लगभग बीस प्रतिशत के बराबर है। इस तरह 24 घंटे में अनुमानत: 1700 लीटर खून का शुद्धीकरण होता है।

12. गुर्दा मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। गुर्दे की खराबी, किसी गंभीर बीमारी या मौत का कारण भी बन सकती है।

13. दुनिया में लगभग 500 मिलियन लोग गुर्दे की बीमारियों से ग्रसित हैं।

14. दोनों गुर्दे खराब होने पर व्यक्ति 1 गुर्दा ट्रांसप्लांट (Kidney Transplant) से सामान्य व्यक्ति की तरह जीवन जी सकता है।

15. क्या आप को मालूम है कि पेशाब (Urine) की मात्रा में अत्यंत कमी या वृद्धि गुर्दे के रोग का संकेत है।


अब समझते हैं किडनी की गंभीर बीमारी के बारे में ..


क्रॉनिक किडनी फेल्योर
शुरूआत में इस रोग के लक्षण स्पष्ट नहीं होते लेकिन धीरे-धीरे थकान, सुस्ती व सिरदर्द आदि होने लगते हैं। कई मरीजों में पैर व मांसपेशियों में खिंचाव, हाथ-पैरों में सुन्नता और दर्द होता है। उल्टी, जी-मिचलाना व मुंह का स्वाद खराब होना इसके प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :
इस रोग में किडनी की छनन-यूनिट (नेफ्रॉन्स) में सूजन आ जाती है और ये नष्ट हो जाती है। डायबिटीज व उच्च रक्तचाप से भी किडनी प्रभावित होती है। पॉलीसिस्टिक किडनी यानी गांठें होना, चोट, क्रॉनिक डिजीज, किडनी में सूजन व संक्रमण, एक किडनी शरीर से निकाल देना, हार्ट अटैक, शरीर के किसी अन्य अंग की प्रक्रिया में बाधा, डिहाइड्रेशन या प्रेग्नेंसी की अन्य गड़बडियां
इसका कारण हो सकती हैं ।
लक्षण : पेशाब कम आना, शरीर विशेषकर चेहरे पर सूजन, त्वचा में खुजली, वजन बढ़ना, उल्टी व सांस से दुर्गध आने जैसे लक्षण हो सकते हैं।

आयुर्वेद में इलाज:
आयुर्वेद में दोनों किडनियों, मूत्रवाहिनियों और मूत्राशय इत्यादि अवयवों को मूत्रवह स्रोत का नाम दिया गया है। पेशाब की इच्छा होने पर भी मूत्र त्याग नहीं करना और खानपान जारी रखना व किडनी में चोट लगना जैसे रोगों को आयुर्वेद में मूत्रक्षय एवं मूत्राघात नाम से जाना जाता है। आयुर्वेदिक के अनुसार रूक्ष प्रकृति व विभिन्न रोगों से कमजोर हुए व्यक्ति के मूत्रवह में पित्त और वायु दोष होकर मूत्र का क्षय कर देते हैं जिससे रोगी को पीड़ा व जलन होने लगती है, यही रोग मूत्रक्षय है। इसमें मूत्र बनना कम या बंद हो जाता है।

क्या है उपाय :
इस तरह की समस्या होने पर यह उपाय अपनाएं, तनाव न लें। नियमित अनुलोम-विलोम व प्राणायाम का अभ्यास करें। ब्लड प्रेशर बढ़ने पर नमक, इमली, अमचूर, लस्सी, चाय, कॉफी, तली-भुनी चीजें, गरिष्ठ आहार, अत्यधिक परिश्रम, अधिक मात्रा में कसैले खाद्य-पदार्थ खाने, धूप में रहने और चिंता से बचें। काला नमक खाएं, इससे रक्त संचार में अवरोध दूर होता है। किडनी खराब हो तो ऎसे खाद्य-पदार्थ न खाएं, जिनमें नमक व फॉस्फोरस की मात्रा कम हो। पोटेशियम की मात्रा भी नियंत्रित होनी चाहिए। ऎसे में केला फायदेमंद होता है। इसमें कम मात्रा में प्रोटीन होता है।
तरल चीजें सीमित मात्रा में ही लें। उबली सब्जियां खाएं व मिर्च-मसालों से परहेज करें।

औषधियां: आयुर्वेदिक औषधियों पुनर्नवा मंडूर, गोक्षुरादी गुग्गुलु, चंद्रप्रभावटी, श्वेत पर्पटी, गिलोय सत्व, मुक्ता पिष्टी, मुक्तापंचामृत रस, वायविडंग इत्यादि का सेवन विशेषज्ञ की देखरेख में ही करें। नियमित रूप से एलोवेरा, ज्वारे व गिलोय का जूस पीने से हीमोग्लोबिन बढ़ता है।

कैसी हो डाइट : गाजर, तुरई, टिंडे, ककड़ी, अंगूर, तरबूज, अनानास, नारियल पानी, गन्ने का रस व सेब खाएं लेकिन डायबिटीज है तो गन्ने का रस न पिएं। इन चीजों से पेशाब खुलकर आता है। मौसमी, संतरा, किन्नू, कीवी, खरबूजा, आंवला और पपीते खा सकते हैं। रात को तांबे के बर्तन में रखा पानी सुबह पिएं। सिरम क्रेटनीन व यूरिक एसिड बढ़ने पर रोगी प्रोटीन युक्त पदार्थ जैसे मांस, सूखे हुए मटर, हरे मटर, फै्रंचबीन, बैंगन, मसूर, उड़द, चना, बेसन, अरबी, कुलथी की दाल, राजमा, कांजी व शराब आदि से परहेज करें। नमक, सेंधा नमक, टमाटर, कालीमिर्च व नींबू का प्रयोग कम से कम करें। इस रोग में चैरी, अनानास व आलू खाना लाभकारी होता है।

डॉक्टर से लें सलाह : किडनी से सम्बंधित किसी भी प्रकार के लक्षण दिखने पर या कोई भी समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लें । जीवक आयुर्वेदा के हेल्पलाइन नम्बर 7704996699 पर निःशुल्क परामर्श ले सकते हैं ।


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